रियल एस्टेट का मार्केट समय के साथ रफ्तार में तो है लेकिन एक वास्तविकता यह भी है कि घरों की ब्रिकी उम्मीद से कम हो रही है। देश के जाने-माने डेवलपर्स इस जुगत में लगे रहते हैं कि घरों की ब्रिकी में तेज़ी आए। लेकिन घरों की खरीद के मामले में आर्थिक पहलू जुड़े होते हैं। आम लोगों के पास जब तक ढंग का पैसा नहीं होगा, तब तक वे घर खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। बढ़ती महंगाई के असर ने लोगों को बेदम कर रखा है। स्थिति आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया वाली है।
जेब पर खाने-पीने से लेकर रहन-सहन भारी पडऩे लगे हैं। हालांकि उच्च मध्यम वर्ग वाले के पास निवेश करने के ऑप्शन भले ही मौजूद हो, लेकिन मध्यम व निम्र आय वर्ग वालों पर घर लेना या कहीं निवेश करना आसान नहीं होता है। जि़न्दगी भर की जमा-पूंजी घर में लगाना तभी संभव हो पाता है, जब उसे बैंक होम लोन की सुविधा प्रदान करता है। यह तो बैंक ही है, जो होम लोन देकर आपके आशियाने के सपने को साकार कर रहे हैं। स्थिति जब ऐसी हो तो प्रॉपर्टी मार्केट में कुछ न कुछ ऐसी व्यवस्था डेवलपर्स द्वारा प्रदान की जाती है, जो आपके घर लेने का सपना सकार हो सके। इसके लिए वह एक सशक्त माध्यम ऑफर या स्कीम को चुनते हैं। ऑफर या स्कीम का माध्यम भले ही सशक्त हो लेकिन इसके पीछे कई तर्कहोते हैं, जो सोच-समझ कर फायदा उठाने में ही भलाई है। देखा जाय तो रियल एस्टेट का बाज़ार में सुस्ती छाई होने के पीछे अर्थव्यवस्था में सुस्ती और कीमतों का आम आदमी की पहुंच से बाहर होना माना जाता है। यह हाल महानगर के रियल एस्टेट का ही नहीं, बल्किर टियर टू-थ्री शहरों में भी है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, सरकार की कमजोर नीति और अर्थव्यस्था में मंदी की वजह से परेशान है। इसी कारण यह सेक्टर भी कमजोर दिखाई दे रहा है। डेवलपर्स रेजिडेंशल प्रॉपर्टी को समय पर पूरा नहीं कर पा रहे हैं और इसकी मुख्य वजह खराब प्रोजेक्ट मैनेजमेंट है। दूसरी वजह ऊंची महंगाई और बढ़ती निर्माण लागत है, इस कारण भी प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो पा रहे हैं। अधिकतर डेवलपर्स नगदी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। उनके पास प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पैसा नहीं है। एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में लगाकर अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं, जिसके कारण तय समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाते हैं। रियल एस्टेट में रेगुलेटर नहीं होने से भी परियोजनाओं में देरी हो रही है।
जेब पर खाने-पीने से लेकर रहन-सहन भारी पडऩे लगे हैं। हालांकि उच्च मध्यम वर्ग वाले के पास निवेश करने के ऑप्शन भले ही मौजूद हो, लेकिन मध्यम व निम्र आय वर्ग वालों पर घर लेना या कहीं निवेश करना आसान नहीं होता है। जि़न्दगी भर की जमा-पूंजी घर में लगाना तभी संभव हो पाता है, जब उसे बैंक होम लोन की सुविधा प्रदान करता है। यह तो बैंक ही है, जो होम लोन देकर आपके आशियाने के सपने को साकार कर रहे हैं। स्थिति जब ऐसी हो तो प्रॉपर्टी मार्केट में कुछ न कुछ ऐसी व्यवस्था डेवलपर्स द्वारा प्रदान की जाती है, जो आपके घर लेने का सपना सकार हो सके। इसके लिए वह एक सशक्त माध्यम ऑफर या स्कीम को चुनते हैं। ऑफर या स्कीम का माध्यम भले ही सशक्त हो लेकिन इसके पीछे कई तर्कहोते हैं, जो सोच-समझ कर फायदा उठाने में ही भलाई है। देखा जाय तो रियल एस्टेट का बाज़ार में सुस्ती छाई होने के पीछे अर्थव्यवस्था में सुस्ती और कीमतों का आम आदमी की पहुंच से बाहर होना माना जाता है। यह हाल महानगर के रियल एस्टेट का ही नहीं, बल्किर टियर टू-थ्री शहरों में भी है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, सरकार की कमजोर नीति और अर्थव्यस्था में मंदी की वजह से परेशान है। इसी कारण यह सेक्टर भी कमजोर दिखाई दे रहा है। डेवलपर्स रेजिडेंशल प्रॉपर्टी को समय पर पूरा नहीं कर पा रहे हैं और इसकी मुख्य वजह खराब प्रोजेक्ट मैनेजमेंट है। दूसरी वजह ऊंची महंगाई और बढ़ती निर्माण लागत है, इस कारण भी प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो पा रहे हैं। अधिकतर डेवलपर्स नगदी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। उनके पास प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पैसा नहीं है। एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में लगाकर अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं, जिसके कारण तय समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाते हैं। रियल एस्टेट में रेगुलेटर नहीं होने से भी परियोजनाओं में देरी हो रही है।








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