मुकेश के झा
वास्तुकला के चुनींदा नमूनों में शुमार विक्टोरिया मैमोरियल हॉल वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। इस स्मारक में शिल्पकला का सुन्दर मिश्रण है। इसकी मुगल शैली की गुम्बदों में सारसेनिक और पुनर्जागरण काल की शैलियां स्पस्ट दृष्टिïगोचर होती है। यहां एक शानदार संग्रहालय हैं, जहां रानी के पियानो और स्टडी डेस्क सहित कई और अन्य महत्वपूर्ण पेंट्गिस को रखा गया है। इसे दिवंगत रानी क्वीन विक्टोरिया की याद को मुकम्मल करने के लिए लॉर्ड कर्जन ने बनवाया था. वैसे इसके पीछे यह भी मंशा थी कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी दंभ ''मौखिक या मुद्रित'' रूप में ही नहीं, ईंट-पत्थरों से बने ऐतिहासिक स्मारक के रूप में भी कायम रहे.
सिटी ऑफ जॉय के नाम से मशहूर कोलकाता में विक्टोरिया महल एक अद्वितीय ऐतिहासिक कृति है। इसकी पूरी संरचना में उस समय के इतिहास के कई झलक देखने को मिलती हैं। उस समय इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के नाम पर इस ऐतिहासिक धरोहर का नाम विक्टोरिया मेमोरियल रखा गया। यह कृति महारानी और अंग्रेज के प्रभुसत्ता का प्रतीक थी। इसे निर्माण करने के पीछे उद्देश्य था कि कि महारानी के नाम के साथ उनकी यश और कृति को मशहूर करना। इस मेमोरियल हॉल के वास्तुकार सर विलियम एमर्सन थे, जिनको आयरलैंड स्थित बेलफेस्ट सिटी हॉल के अनुसार बनाना था जो Italian Renaissance style पर आधारित था, लेकिन विलियम इसका निर्माण इस रूप में नहीं करना चाहते थे। इसके निर्माण कार्य में वे मुगल शैली का भी सामंजस्य भी करना चाहते थे। विन्सेट इसाक जो प्रमुख वास्तुकार थे, उन्होंने लॉर्ड रेडसेडेल और सर डेविड प्रेन की अगुवाई में यहां स्थित भव्य गार्डन की डिज़ायन तैयार किया। उस समय कोलकाता के मेसर्स मार्टिन एण्ड को. कन्सट्रक्शन कंपनी ने इस कार्य के लिए सहयोग दिया था। इस ऐतिहासिक धरोहर का निर्माण कार्य सन् 1906 से शुरु होकर 1921 तक चला। दूधिया मारबल इस मेमोरियल हॉल की सुन्दरता में चार चांद लगाता है। मेमोरियल हॉल के दक्षिणी छोर पर स्थित भव्य गार्डन उसकी खूबसूरती को और बढ़ा देता है। गुम्बद के सबसे ऊपर के हिस्से में महारानी का भव्य मूर्ति के हाथ में काले रंग का तांबे का विक्टरी क्रॉस ब्रितानी हुकूमत का प्रतीक था। इस विजय के प्रतीक को एक मज़बूत खम्बे और बॉल-वियरिंग के सहारे रखा गया है।
विक्टोरिया मेमोरियल में ब्रिटीश राज्य के समय का कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और मोन्युमेंटस् रखे गये हैं। जिस समय इसका निर्माण किया गया, उस समय ब्रिटीश राज्य का भारत में उत्कर्ष का समय था और सिटी ऑफ जॉय के नाम से यह सिटी मशहूर भी हो चुका था । यहां ब्रिटीश राज्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण कार्य किया जा रहा था। इसके निर्माण कार्य में वास्तु अपने उत्कर्ष पर पहुंच चुका था। राजधानी होने के नाते ऐसा संभव भी हो रहा था । भारत में उस समय का वायसराय लार्ड कर्जन थे, जो स्वयं चाहते थे कि प्रसिद्ध वास्तुकार सर विलियम एमर्सन हर निर्माण कार्य को एक क्लासिकल पुट दें और बेहतर से बेहतर भवन का निर्माण हो। इस प्रसिद्ध वास्तुकार का प्रभाव उस समय के सारे इंग्लिश भवन निर्माण कार्य में स्पष्टï दिखता था । उस समय के बेलफास्ट सिटी हॉल जो आयरलैंड में स्थित है, इस निर्माण कार्य में सर विलियम एमर्सन का स्पष्ट प्रभाव था।
वर्तमान समय में विक्टोरिया मेमोरियल एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन चुकी है। यहां के पार्क की सुन्दरता किसी को भी मन मोह सकती है। सुबह से लेकर शाम तक लोगों का हुजूम इस मेमोरियल हाउस को देखने के लिए हर रोज़ उमर पड़ता है । यह स्मारक पूरी तरह से संरक्षित और सुरभित है। विक्टोरिया मेमोरियल हॉल को सन् 1921 में खोल दिया गया। यहां के म्यूजियम में आप भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण समय का झलक देख सकते हैं। इस म्यूजियम में कोलकाता के इतिहासों के रूप-रेखा से संबन्धित दस्तावेज़ को बड़ी ही बारिकी से सहेज कर रखा गया है। यहां उपलब्ध मोन्युमेंट्स देश के इतिहास और कोलकोता के इतिहास का वर्णन दर्शाते हैं । इस म्यूजियम को बनाने में लार्ड कर्जन का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिसके कारण वर्तमान समय में यह स्थान अपने अतीत को एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। यह प्रसिद्ध बिल्डिंग और आर्ट म्यूजियम दोनों ही भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ कल्चर के अन्तर्गत आता है जिसे इसके तत्वाधान में देख-रेख भी किया जा रहा है। यह बिल्डिंग महारानी विक्टोरिया की मूर्ति के बेस से लेकर ऊपर तक 184 फीट का है और अन्य 16 फीट की है। यहां उपस्थित उत्तरी भाग में कला समर्पित कई मूर्ति हैं, जो मातृत्व, विश्वास और अध्ययन का प्रतीक है। इस बिल्डिंग का मुख्य गुम्बद कला, वास्तु, न्याय और दान के चित्रों के कारण गुम्बद जीवंत हो उठती है। विक्टोरिया मेमोरियल 64 एकड़ में फैली हुई है, जिसमें 338 ft by 228f के क्षेत्रों में भवन निर्माण हुआ है। इस मेमोरियल हॉल बनाने में करीब 1,050,000,000 रुपये की लागत आयी। ऊंचाई बिना मूर्ति का 184 फीट, चौड़ाई 226 फीट और इसका वजन करीब 80,300 टन है। इसके निर्माण कार्य में अंग्रेजों से ज्यादा भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान था। प्रसिद्ध वास्तुकार विलियम एमर्सन ने इस बिल्डिंग के स्वरूप को एक नया कलेवर और अन्दाज़ दिया। विलियम सर्वप्रथम भारत में इस निर्माण के चालीस साल पूर्व आए हुए थे। उनका प्रारम्भिक कार्य यहां बहुत ही प्रसिद्ध रहा और उनको इस कार्य से खूब प्रसिद्धि भी मिली। बम्बई के क्राउफोर्ड मार्केट सन् 1865 में इनके देखरेख में बनाया गया जो अपने आप में वास्तु का अनुपम उदाहरण है, लेकिन इलाहाबाद में सेंट कैथेड्रल का निर्माण कार्य अधूरा ही रह गया। कुछ प्रमुख प्रोजेक्टों में एमर्सन ने मध्यकालीन भारत में प्रसिद्ध गोथिक शैली का प्रयोग किया था। इस प्रसिद्ध वास्तुकार का प्रतिभा सही मायने में इलाहाबाद के Muir कॉलेज में स्पष्टï दृष्टिगोचर होता है। एमर्सन ने उस समय देश के कई प्रमुख स्थानों वास्तु का नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया ।
जब एमर्सन 60 वर्ष के हो गए, तब उन्होंने अपने वास्तु के कार्य को भलीभांति संपादित करने के लिए एक सहयोगी विन्सेट जे. इसाक को रख लिया। इस नौजवान वास्तुकार को एमर्सन खूब पसंद करते थे, भला हो भी क्यों नहीं, इसाक में कूट-कूट कर प्रतिभा भरी होना था। इसाक ने अपने करियर की शुरुआत यहीं से की और बंगाल-नागपुर रेलवे जोन में नियुक्ति जूनियर इंजीनियर के रूप नियुक्त हो गया. नियुक्ति के बाद इसाक को यहां कार्य करने के लिए कई सुनहरे अवसर मिले । इन अवसरों का उन्होंने खूब फायदा भी उठाया। काम के साथ उनका अनुभव भी बढ़ता ही चला गया। वह अब एक अच्छे वास्तुकार बन चुके थे। वर्ष 1902 में उनको विक्टोरिया मेमोरियल की डिज़ायन तैयार करने का मौका मिला लेकिन वह चाहते थे कि इस कार्य में कोई अन्य भाग नहीं लें। इस कार्य को भलीभांति संपादित करने के लिए इसाक ने वायसराय को कहा कि इस कार्र्य का दायित्व निर्वहन आसानी से कर सकते हैं लेकिन किसी और का इसमें हस्तक्षेप नहीं हो। लेकिन कर्जन को इनका यह प्रस्ताव शायद पसंद नहीं आया। कर्जन चाहते थे कि इस कार्र्य को करने से पहले इसाक कोई अन्य कार्य को बेहतर रूप में कर दिखाए। उनकी प्रतिभा को परखने के लिए कर्जन ने उस समय बन रहे दिल्ली में दिल्ली दरबार के लिए उनको वास्तुकार के रूप में मौका दिया।
इस दरबार के निर्माण को लेकर कर्जन चाहते थे कि इसमें इटालियन वास्तु शैली का प्रयोग हो लेकिन इसाक इसे अपने अंदाज़ में बनाना चाहते थे, जबकि कर्जन इसे मुगल शैली के साथ सामंजस्य करके बनबाना चाहते थे। लेकिन बात को सही रूप से समझने में इन दोनों को समय लग गया, इसलिए इसाक की नियुक्ति विक्टोरिया मेमोरियल को लेकर जल्दी नहीं हो पाई। परन्तु विक्टोरिया मेमोरियल का कार्य धीरे ही सही लेकिन शुरुआत हो चुकी थी। शनै:-शनै: इसका कार्य जारी था। कर्जन वर्ष 1905 में भारत से चले गए, उसके बाद जो भी वायसराय बनकर भारत आए, सांस्कृतिक धरोहर के निर्माण को खास तबज्जो नहीं दी।
लेकिन इसी बीच इसाक ने सन् 1907 में बंगाल डिज़ायन क्लब के तत्वाधान में कलकत्ता के चौरंगी नामक स्थान पर बिल्डिंग निर्माण को लेकर चल रही डिज़ायन की प्रतियोगिता को जीत ली। इस जीत ने जहां एक तरफ उनकी करियर में एक नयी ऊंचाई दी, वहीं दूसरी तरफ देश के अच्छे वास्तुकारों में उनकी गिनती भी होने लगी। ठीक उसी समय बंगाल-नागपुर रेलवे जोन का कार्य भी उनके जिम्मे आ गया और उस समय के प्रसिद्ध गार्डन रिच का डिज़ायन तैयार करने की जिम्मेदारी दे दी गयी। इन दोनों स्थानों पर उनकी डिज़ायन को बहुत सराहा गया और उसके बाद तो इसाक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे अब कलकत्ता के प्रसिद्ध वास्तुकार बन चुके थे, उनकी प्रतिभा का लोहा सभी लोगों ने मान लिया। उनको औपचारिक रूप से कलकत्ता के वास्तु के कार्य को निरीक्षण करने का दायित्व सौंपा गया। उस समय भारत के प्रमुख क्षेत्रों में उनकी प्रतिभा की तूती बोलने लगी। उनके प्रमुख क्लाइंट में इलाहाबाद बैंक, रॉयल टर्फ क्लब, डंकन ब्रदर्स जैसे हस्तियां थीं। हैदराबाद के निजाम अपनी राजधानी की बेहतर साज-सज्जा के लिए उनको नियुक्त किया था। उन्होंने उस समय हैदराबाद में कई महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण कार्य किया, जिसमें प्रमुख रूप से रेलवे स्टेशन, हाई कोर्ट, सिटी हाई स्कुल और ओसमानिया अस्पताल शामिल था।
उस समय विक्टोरिया मेमोरियल को लेकर एक खास बात यह थी कि लोग उसकी तुलना ताजमहल से करने लगे थे। इसी कारण तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन इस मेमोरियल के निर्माण के लिए सफेद संगमरमर का प्रयोग ठीक उसी प्रकार करना चाहते थे, जिस प्रकार से शाहजहां ने ताजमहल बनाने में इस संगमरमर का प्रयोग किया था । कर्जन सफेद संगमरमर राजस्थान और मरकाना से लाकर एक भव्य भवन के रूप में विक्टोरिया मेमोरियल को यादगार बनाने का पक्का इरादा कर लिया । इसका स्वरूप को भी ताजमहल के हिसाब से बनाने के लिए महान गुम्बद के साथ चार सहायक, अष्टकोना गुम्बददार छतरी, उच्च पोर्टल्स, छत और और अन्य गुम्बदों का समूह इसे भव्य रूप देता है। सचमुच यह भवन ताजमहल के बाद सबसे सुन्दर कृति है। लार्ड कर्जन चाहते थे कि इसे एक ऐसे रूप में बनाया जाय जो महारानी विक्टोरिया के लिए एक यादगार धरोहर हो। यह मुगल कला और ब्रिटिश कला के अनोखे संगम के रूप में है, जिसे कलाकारों ने जीवंत रूप दिया है। यह काफी हद तक भारतीय धरोहर के महत्वपूर्ण स्वरूप का रूपांतरित भाग है।
यहां पर ब्रिटिश कलाकारों ने कोलकाता में अंग्रेजी राज के जमाने के दुर्लभ चित्रों को दी नई जान और वही पुरानी चमक -दमक को स्मारकों के निर्माण और परंपराओं के पालन में, ब्रिटेन के पुराने कलाकारों के बनाए कई चित्रों को इस इमारत में लाकर रखा गया. इनमें घुमंतू चाचा-भतीजा थॉमस और विलियम डैनियल के बनाए चित्र भी शामिल थे. वास्तव में इसे कर्जन भारतीय और अरबी संस्कृति के रूप इसे विख्यात करना चाह रहे थे। चूंकि वास्तुकार एमर्सन मुगल वास्तु से प्रभावित थे। इस प्रसिद्ध भवन का डिज़ायन तैयार किया गया वर्ष 1901 में और 1904 निर्माण कार्य की शुरुआत हुई। वर्ष 1906 में प्रिंस वेल्स ने यहां का दौरा किया और इस भवन की नींव रखी लेकिन अगले चार सालों तक इसका निर्माण कार्य धीमा ही रहा। उसके बाद 4 जनवरी, 1912 को इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम यहां आकर इसके निर्माण कार्य की प्रगति रिपोर्ट देखी। उससे कुछ महीने पूर्व ही भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली कर दी गयी थी। इसके साथ ही विक्टोरिया मेमोरियल का कार्य भी जारी रहा लेकिन 28 दिसंबर, 1921 में ही बनकर तैयार हो पाया। प्रिंस वेल्स ने आकर इस विख्यात धरोहर को खोल दिया। उसी समय प्रिंस हैदराबाद गये हुए थे, वास्तुकार इसाक का कार्य उनको प्रभावित कर गया और वे चाहते थे कि इस मेमोरियल की भव्यता को दुनिया के सामने लाने के लिए इसाक इसके डिज़ायन में महत्वपूर्ण योगदान दें। एमसर्न के डिज़ायन को आगे बढ़ाते हुए, इसाक ने वास्तुकला के अनुपम रूप में इसको ढाला।








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